ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की चट्टानों को तोड़के।
ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की
चट्टानों को तोड़के।
चढ़ जाते हैं आर्य बहादुर,
दौड़-दौड़के।
पापिस्तानी दरिन्दों को,
कारगिल लड़ाई में।
एक-एक को चुन-चुन मारा,
भारतीय सिपाही ने।
सीमाओं से भगा दिए
मारे बंकर तोड़ के।
कवि ‘बेकल’ कहे जान बचाई
हाथ जोड़ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों….।
चार वेद मनुस्मृति ऋषियों
का ये कहना है।
सीने ऊपर चोट लेना
वीरों का ये गहना है।
रहना अगर शान से जा
दुश्मन को मरोड़।
टूटे हुए आइनों के टुकड़े
जोड़-जोड़ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों…..
अकेला था वीर जिसका,
कर ना कुछ हजार सके।
बादशाह वजीर सारे,
बदला ना उतार सके।
चोट नहीं मार सके,
अमरसिंह राठौर के।
इतिहासों में दाग लगा हुआ
अर्जुन गौड़ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों…।
बारह साल पेट भरके,
रोटी नहीं खाई थी।
अकबर के दरबार कभी,
गर्दन ना झुकाई थी।
स्याही नहीं लाई बापा रावल
और चित्तौड़ के।
आखिर मुगल सेना भागी
रणभूमि को छोड़ के ऊँचे-
ऊँचे पहाड़ों….।










