त्याग तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ जिसका तन है।
त्याग तपस्या से पवित्र-
परिपुष्ट हुआ जिसका तन है।
भद्र भवना-भरा स्नेह-
संयुक्त शुद्ध जिसका मन है।।
होता व्ययनित प्रति पर
हित में जिसका शुचि संचित धन है।
वही श्रेष्ठ सच्चा ‘मानव’ है,
धन्य उसी का जीवन है।।










