तुम निराकार हो भगवन्

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तुम निराकार हो भगवन्

तुम निराकार हो भगवन्
कोई मूरत बनाऊँ तो कैसे
तुम बनाते हो सारे जहाँ को
मैं तुमको बनाऊँ तो कैसे

सारी सृष्टि में तुम बस रहे हो (1)
कोई जर्रा नहीं तुमसे खाली (1)
तुम व्यापक हो सारे जहाँ में (1)
मन्दिर में बिठाऊँ तो कैसे

सारे जग में प्रकाश है जिनका (2)
ये सूरज चाँद और तारे (2)
है तुम्हारी ही ज्योति से रोशन (2)
तुम्हें दीपक दिखाऊँ तो कैसे

ये वन उपवन जो कुछ भी
तुम ही ने बनाया है भगवन्
फूलों में तुम ही बसे हो
इन्हें तुम पर चढ़ाऊँ तो कैसे

तुम पिता, तुम ही माता हो
त्रुटियों का ध्यान न करना (3)
(त्रुटियों पर भी ध्यान देना) (3)
तुम हो करुणा के सागर
मैं तुमको मनाऊँ तो कैसे

प्रभु विनय “सरोज” की सुनना
अपने से दूर न करना
व्याकुल हूँ नाथ तुम्हारे
मैं दर्शन पाऊँ तो कैसे