तुझसे भिन्न न कोई जग में

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तुझसे भिन्न न कोई जग में

तुझसे भिन्न न कोई जग में
सब में तू ही समाया है
जड़ चेतन सब तेरी रचना
तुझमें आश्रय पाया है
हे सर्वोपर !! विभो विश्व का
तूने साज सजाया है
हेतु रहित अनुराग दीजिये
यही भक्त को भाया है

निन्दित लोग बुराई करें
चाहे सारा देश प्रशंसा गाये
आर्थिक लाभ मिले अथवा
सम्पत्ति समस्त भले नष्ट जाये
यह देह युगों तक स्वस्थ रहे
चाहे मौत अभी लेने आ जाये
लेकिन न्याय से धीर पुरुष ना
पैर कभी “नरदेव” हटाये

ज्ञान रूपी गङ्गा
और कर्म रूपी यमुना में
बोल प्राणी बोल
गोता लेगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
कर्म रूपी यमुना में
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं

ऋषि मुनि सब हार गये हैं
शोक तुझे – समझाने में
वेदों की विद्या से बढ़ कर
शिक्षा नहीं है जमाने में
वेदों की विद्या का असर
कुछ होगा की नहीं
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
कर्म रूपी यमुना का
बोल बन्दे बोल
मिलना होगा की नहीं

भक्ति रूपी सरस्वती बिन
ज्ञान और कर्म अधूरा है
तीनों नदियों के मिलने से
सङ्गम होता पूरा है
इन्द्रियों पर तेरा
शासन होगा कि नहीं
बोल बन्दे बोल
मिलना होगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
कर्म रूपी यमुना का
बोल बन्दे बोल
मिलना होगा की नहीं
बोल प्राणी बोल
मिलना होगा की नहीं

कर ले तू कर्म निष्काम भाव से
तज कर के आशा फल की
ना जाने कब तक है जीवन
खबर नहीं है इक पल की
मानव जन्म दुबारा
फिर ये होगा कि नहीं
बोल प्राणी बोल
मिलना होगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
कर्म रूपी यमुना में
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं

मन और वचन कर्म में जब तक
तू एकता नहीं लायेगा
तब तक प्यारे ! इस जीवन को
सफल नहीं कर पाएगा
अन्धकार तेरे मन का
दूर होगा कि नहीं
बोल प्राणी बोल
गोता लेगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
कर्म रूपी यमुना में
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं
बोल बन्दे बोल
गोता लेगा की नहीं

इधर उधर क्यूँ भटक रहा है
मन में ज्योति जगा ले
आत्मा का परमात्मा से
सङ्गम कर के दिखला दे तू
“नन्द लाल” मेरे जन्म सफल ये
होगा कि नहीं
सोच प्राणी सोच
सङ्गम होगा की नहीं
ज्ञान रूपी गङ्गा
और कर्म रूपी यमुना का
सोच प्राणी सोच
सङ्गम होगा की नहीं