तू स्तुत्य बना है मेरा,और मैं हूँ स्तोता तेरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
और मैं हूँ स्तोता तेरा
इच्छाएँ पूर्ण तू कर दे
निज प्रेम बरसा दे गहरा
जल से भरी जैसे नदियाँ
हों इष्टी की वैसी निधियाँ
भूखा है दर्श को यह मन
मुझे दर्श दिखा दे तेरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
और मैं हूँ स्तोता तेरा
इच्छाएँ पूर्ण तू कर दे
निज प्रेम बरसा दे गहरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
नित अनुभव नए कराए
नित्य रूप नए दिखाए
बल-ज्ञान के अश्व जुताए
सन्सार रूप रथ तेरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
और मैं हूँ स्तोता तेरा
इच्छाएँ पूर्ण तू कर दे
निज प्रेम बरसा दे गहरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
तेरे रथ के योग्य हो जाऊँ
बुद्धि से लक्ष्य को पाऊँ
‘हरिवान’ रूप को देखूँ
सम्भजन में ध्यान हो मेरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
और मैं हूँ स्तोता तेरा
इच्छाएँ पूर्ण तू कर दे
निज प्रेम बरसा दे गहरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
मुझ स्तोता की सुध ले ले
दे साथ रहूँ ना अकेले
हे इन्द्र !!! कृपा बरसा दे
हृदय में कर ले बसेरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
और मैं हूँ स्तोता तेरा
इच्छाएँ पूर्ण तू कर दे
निज प्रेम बरसा दे गहरा
तू स्तुत्य बना है मेरा
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * 8.3.2001 2.40PM
राग :- गौड़ सारंग
गायन समय दिन का तीसरा प्रहर, ताल कहरवा८ मात्रा
शीर्षक :- हे परमेश्वर ! वैदिक भजन ८७४वां
*तर्ज :- *
824-0225
शब्दार्थ :-
स्तुत्य = स्तुति योग्य
स्तोता = स्तुति करने वाला
इष्टि = इच्छा
अश्व = घोड़ा
हरिवान = प्रकाशमान
संभजन = सदा भजन में लगा हुआ
बसेरा = मार्ग में ठहरने की जगह, अस्थाई निवास
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
हे परमेश्वर !
हे परमेश्वर! तू सदा सब संतो द्वारा स्तुति किया गया है। मैं भी आज तेरी ही स्तुति कर रहा हूं स्तूयमान होता हुआ तू अब तो मुझ स्तोता की भी इच्छाओं को पूर्ण कर दे। मुझे वह ‘इष’प्रदान कर दे जिसका मैं भूखा हूं। इस अन्न से तू मुझे छका दे। जैसे नदियां जल से भरपूर होती हैं, वैसे तू मुझे मेरे ‘इष’ से भरपूर कर दे। मैं तो तेरे दर्शन का भूखा हूं। अपना यह दर्शन देखकर हे इन्द्र! तू मुझे पूरी तरह परितृप्त कर दे। मैंने आज तेरा नया अनुभव किया है, तेरे एक नए स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया है और मैंने तेरे इसी स्वरूप के खूब गुण गाए हैं। हे हरिवन् ! तू अब अपने इस रूप के दर्शन देकर मुझे पूरी तरह तृप्त कर दे।
हे हरियोंवाले! मैं देखता हूं कि तू अपने इस संसार रूपी रथ को अपनी ज्ञान- क्रिया और बलक्रिया के हरियों(घोड़ों) से संचालित कर रहा है। तेरे इस स्वरूप को देखकर मैं अब और कुछ नहीं चाहता, इतना ही चाहता हूं कि मैं तेरे इस रथ के योग्य हो जाऊं, ‘रथ्य’हो जाऊं, इस तेरे संसार में बसने योग्य हो जाऊं, सच्चा मनुष्य बन जाऊं, तेरा मनुष्य बन जाऊं। अब मैं तेरा मनुष्य बन कर ही इस संसार में रहना चाहता हूं। तेरे हरिवान् रूप को देखकर अब मैं चाहता हूं कि अपनी बुद्धि से अपने कर्म से तेरा ‘रथ्य’ हो जाऊं और सदा तेरा संभजन करने वाला हो जाऊं। तेरा ‘रथ्य’होने के लिए यह आवश्यक है कि मैं सदा तेरा संभजन किया करूं। इसलिए हे इन्द्र ! अब तू ऐसी कृपा कर कि मैं अपनी प्रत्येक बुद्धि से, अपने प्रत्येक कर्म से सदा रथ्य बना रहूं और सदा तेरा संभजन करनेवाला बना रहूं।
🎧874 वां वैदिक भजन🕉👏🏽










