तृप्त नहीं हो पाती तृष्णा विषयों की

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तृप्त नहीं हो पाती तृष्णा विषयों की

तृप्त नहीं हो पाती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की

भोग प्रवृत्ति सुख का मूल जलाती है
घी बनकर दुःख अग्नि और बढाती है
जन्म जन्म भटकाती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की

रोगी बनकर भोगी कष्ट उठाता है
विषयों में स्थायी सुख नहीं पाता है
दुःख चिन्ता भर जाती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की

विषयी चुम्बक लोहे मन को खींचते है
ज्ञान विवेक के खुले द्वार को मींचते है
बुद्धि भ्रष्ट कराती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की

काम क्रोध मद लोभ में जो भी अटके है
क्षणिक सुखो की चाह में जो भी भटके है
पाप कर्म करवाती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की

लक्ष्य यही ‘हित’ प्रभु गोद को पाना है
पर तृष्णा का काम तो पतित बनाना है
प्रभु से दूर कराती तृष्णा विषयों की
बात मान ले प्यारे वैदिक ऋषियों की