अग्ने मृळ महाँ असि य इमा देवयुं जनम् । इयव बहिरासदम् ॥
तर्ज प्रणय संगति तिन्गळ इदिविरिन्य
जीवन ज्योति हे अग्ने, तुममे ही समा जाएँ।
लेता हूँ थोड़े तिनके तब प्राणों की धोंकनी से, धौंकने को लगाए॥
॥ मेरे जीवन ॥
यूँ तो सारा जगत कुशा है इसके सिवा ना कुछ भी
हैसियत मेरी दो तिनको की, उसके भी स्वामी तुम ही
फूंकने को इन्हें सोच रहा मन, इक चिंगारी दे दो यदि तुम भगवन्॥
॥ मेरे जीवन ॥
जब तक कृपा ना होगी तुम्हारी सर्वमेध होंगे असफल
यज्ञ संकल्पों का सिद्धि पथ, तुम्हीं दिखाते हर पल
क्योंकि तुम्हीं हो यज्ञस्वरूप, तुम ही अनूप हो, मेरे याज्ञिक भगवन् ।
॥ मेरे जीवन॥
होते नहीं तुम विराजमान प्रभो! बहुमूल्य आसनों पर
कुर्सी चौकी सिंहासनों से प्रेम कहाँ तुम्हें प्रभुवर ?
तुम्हें तो केवल कुशा है प्यारी, त्याग-तपस्या का ये अनुपम आसन ।
॥ मेरे जीवन॥
चार दिनों का है ये मेरा तिनकों का आशियाना
तप त्याग संगतिकरण से जीवन मुझको निभाना ।
प्रकट हो रहे इन्हीं में तुम तो, जहाँ तुम्हारा कुशा ही बना सिंहासन ॥
॥ मेरे जीवन॥
आओ बैठो बिछा तुम्हारा दर्भ कुशा का आसन
तेजोमय करो तपस्वी हे तपोमूर्ति हे ब्राह्मण
‘देवयु’ बना हूँ तिनकों का, वो भी है तेरा होगा तुझे समर्पण ॥
॥ मेरे जीवन ॥
आओ देव मैं तिनके लाया तुम चिंगारी लाओ
प्राणों की धौंकनी को तुम तब अग्नि को प्रगटाओ।
कर लो आत्मसात तिनकों को, झाँकी दिखाओ प्रेम की मेरे प्रीतम ॥
(कुशा) तिनका, सूखी घास। (हैसियत) मूल्य। (सर्वमेध) समस्त यज्ञ। (अनूप) अनुपम,
अद्भुत। (आत्मसात) सब प्रकार से अपने आधीन। (आशियाना) रैन बसेरा, घर। (दर्भ)
फाड़ने वाला, विदारक, कँटीला। (देवयु) उपासक। (धौंकनी) हवा फूंकने की नली।










