था वसन्त, परन्तु आर्यजाति-वर-लता नहीं फूली थी
था वसन्त, परन्तु आर्यजाति-वर-लता नहीं फूली थी,
ब्रह्मचर्यं आदित्य-किरण तन-गगन नहीं झूली थी।
क्षमता-शीलता-मेल-मलयमय स्नेह-समीर नहीं था ॥ १ ॥
सामगान-कोयल-कूजन-ध्वनि नहीं सुनाई देती थी,
विद्याचन्द्र विकास चन्द्रिका नहीं दिखाई देती थी।
निठुर जाड्यवश ठिठुरे जन में जीवन ज्योति नहीं थी,
दूर-दूर के हिम-डाकू से पतझड़ लूट कहीं थी ॥ २ ॥
तिमिराच्छन्न गगन धरणी में काल-रात्रि थी छायी,
था अन्धेरा मचा बछिया के बाबा की बन आयी।
पूर्ण चन्द्रमा, दीप अनेकों जो घर-घर जलते थे,
भानुविभा ये सब मिलकर भी उसे न हर सकते थे ॥ ३ ॥
मुरझाती साहित्य-वाटिका माली सुधि भूले थे,
अमल कमल की विमल क्यारियों में जलते चूल्हे थे।
जाई, केतकि, वकुल, मालती, तज कनेर तकते थे,
रुचि बिगड़े कुछ अन्धे भौरे चम्पा पै मरते थे ॥ ४ ॥
अपनी भाषा भाव सभी कुछ भूल मरे जीते थे,
दिन कटते थे श्वासा थी पर तन जीवन-रीते थे।
थी अपूज्य की पूजा होती पूज्य सताये जाते थे,
देवी-देव न कुछ कर सकते, मूषक मौज उड़ाते थे ॥ ५ ॥
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की थी रात्रि महाकल्याणी,
‘शिव-शंकर’ से फाग-मचाता, एक निरंकुश प्राणी।
मठाकाश में दीपशिखा, नभ मलिन ज्योति छायी थी,
दयानन्द के घटाकाश में ज्ञान-ज्योति आयी थी ॥ ६ ॥
ऊपर तारागण, मुसकाते, मन्दिर सजा हुआ था,
महामस्त ‘मूषक’ मनमाना खाना मिला हुआ था।
आस-पास सोये सुमनों में विकच प्रसून लसा था,
नैसर्गिक नीरव वसन्त में सरस वसन्त बसा था ॥ ७ ॥
अर्धनिशा बीती, निद्रा ने भूत स्ववश कर डाले,
एक-एक कर पड़े पुजारी सब ही ढीले-ढाले।
भूत तो हुए, भूतनाथ भी निद्राधीन बने थे,
केवल बालक दयानन्द ही व्रत में डटे-तने थे ॥ ८ ॥
प्रकृति सुन्दरी भी सोई थी काली कम्बली ताने,
नील कमल-मुखगगन खुला था क्षितिज रूप सिरहाने।
वदन गगन पर चन्द्र बिन्दु कुछ रहा छटा सरसाता,
काली कम्बली को कुछ-कुछ था अपने रंग-रंगाता ॥ ९ ॥
शीत-भीतिवश वह भी पीछे कम्बली में घुस भागा,
काला कालाकार वही फिर अन्धकार का जागा।
थे निस्तब्ध सभी नीरवता ने रंग जमाया,
अवसर था चोरों का आया, चूहे का मन भाया ॥ १० ॥
‘चूँ चीं’ कर निज पूँछ नचाता चञ्चल चूहा आया,
भोज्य देख ‘चूं चीं’ कर उसने अपना हर्ष जताया।
लिंग, घण्ट, दीपक सब चुप थे, चुप्प बना था नन्दी,
कौतूहल कुछ देख रहे थे, दयानन्द आनन्दी ॥ ११॥
चूहे की चञ्चलता को लख शंकर चित्र बना था,
दयानन्द सन्दिग्ध बना था ‘नीरव’ मित्र बना था।
मूर्त्तित्तभूत शंकर पर चढ़ता, डरता शंकरजी से,
भेंट चढ़ावे को चट करता चूहा ‘चूँ-चूँ चीं’ से ॥ १२॥
बढ़ी भूख चूहे की, शंकर मूर्त्ति महत्ता भागी, द
यानन्द सन्दिग्ध चित्त में ज्ञान-पिपासा जागी।
‘रुद्र, पिनाकी, भूतनाथ, शंकर जिसको कहते हैं,
त्रिपुरासुर का हन्ता जिसको, यहाँ सभी भजते हैं ॥ १३ ॥
जो खाता विचरण करता है’ – यों पुराण कहते हैं,
क्या यह वह ही महादेव! जिसपर चूहे चढ़ते हैं ?
नहीं कहता, करता, कुछ खाता, पत्थर क्या भक्षेगा,
अपनी रक्षा में अक्षम है, हमको क्या रक्षेगा ? ॥ १४॥
महामूर्खता घोर पाप था, इसे उपास्य बनाना,
ढकोसला है, वञ्चकता है, जड़ को रुद्र बताना।
जड़ की पूजा करते जन भी जड़ बनते जाते हैं,
‘अब इसकी पूजा न करूँगा’ यों कह उठ आते हैं ॥ १५ ॥
आन जगाया जल्दी से, फिर वहीं पिता से पूछा,
‘क्यों तुमको सन्देह उठा’ यह उत्तर पाया छ्छा।
हुआ नहीं सन्तोष, पिता से पर फिर कुछ नहीं बोले,
स्वयं शुद्ध निज बुद्धि तुला में निज विचार जा तोले ॥ १६ ॥
फल लाया कल्याणकारिणी चतुर्दशी का आना,
दयानन्द शंकर ने जिस दिन शिवशंकर को जाना।
करुणाकर जगदीश्वर अब भी ऐसी दया दिखावें,










