कृतज्ञता
तेरे नाम का सुमिरन करके,
मेरे मन में सुख भर आया।
तेरी कृपा को मैंने पाया,
तेरी दया को मैंने पाया।।1॥
तेरी कृपा को मैंने पाया……
दुनिया की ठोकर खाकर,
जब हुआ कभी बेसहारा।
न पाकर अपना कोई,
तब मैंने तुम्हें पुकारा।
हे नाथ मेरे सिर ऊपर,
तूने अमृत बरसाया।।2।
तेरी कृपा को मैंने पाया…….
तू संग में था नित मेरे,
ये नैना देख न पाए।
चंचल माया के रंग में,
ये नैन रहे उलझाए।
जितनी भी बार गिरा हूँ,
तूने पग-पग मुझे उठाया।।3।।
तेरी कृपा को मैंने पाया……….
भवसागर की लहरों में,
भटकी मेरी जब नैया।
तट छूना भी मुश्किल था,
नहीं दीखे कोई खिवैया।
तू लहर बना सागर की,
मेरी नाव किनारे लाया।।4।।
तेरी कृपा को मैंने पाया………….
हर तरफ तुम्हीं हो मेरे,
हर तरफ तेरा उजियारा।
निर्लेप प्रभु जी मेरे,
हर रूप में रंग तुम्हारा।
तेरी शरण में दाता,
मैंने तेरा ही तुमको चढ़ाया।
तेरी कृपा को मैंने पाया…….










