तेरे मान तथा मर्यादा पर
तेरे मान तथा मर्यादा पर,
अंगुली न किसी की उठे
संभल कर चल ।।
तेरे उजले-उजले आंचल
पर धब्बा न कोई भी लगे
संभल कर चल।।
जान रही दुनियाँ तुझ को
तू सावित्री सीता है-तूने
अपने सतीत्व के बल से
सारे जग को जीता है।
अब तेरे इस नंगेपन का
जग में न. ढिंढोरा पिटे
संभल कर चल ।।
भूल नहीं जाना देवी
तेरी यही कहानी है,
घर के बाहर दो कौड़ी
की घर के भीतर रानी है।
बाहर क्या मान कमाओगी
कहीं घर की न शोभा घटे
संभल कर चल ।।
यूं न भटकती फिरा करो,
तनिक संभल कर चला करो,
दोनों कुलों की लाज तुम्हीं हो,
लाज से अपनी डरा करो।
कहीं स्वतन्त्रता के चक्कर में,
लज्जा का ही धन न लुटे
संभल कर चल ।।
उड़-उड़कर तुम तितली-सी
फूल-फूल पर मंडराती,
जहां फूल है वहां शूल भी,
उनसे भय क्यों नहीं खाती।
कहीं उलझ उलझकर कांटों में,
दामन न तुम्हारा फटे
संभल कर चल ।।
लज्जा ही तेरा गहना,
पहने इसे सदा रहना,
मोल न इस पर कोई लगता,
शोभा का पर क्या कहना।
चाहे मुख न छुपाओ घूंघट में,
आंखों की शर्म न घटे
संभल कर चल ।।










