तेरे बिना प्रभु, रहूँगा कैसे?
तेरे बिना प्रभु,
रहूँगा कैसे
चारों ओर छाई तृष्णा
विषय-विषों से,
बचूँगा कैसे ?
जब तक ना लूँगा,
तव कृपा
हृदय के भीतर,
अमृत कलश है,
फिर भी ये जीवन,
क्यों जस का तस है
मिले क्यों ना प्रेरित पन्य प्रज्ञा आपसे
प्रभु मन में ही बस जाना
पल-पल कहे मेरा मन
परमार्थ का हो जाना
क्या मिला तुझसे ?
क्या-क्या गिना दूँ ?
चाहूँ शरण में तेरी
जीवन बिता दूँ ,
किस मुँह से माँगूँ ?
और दिया तो किया क्या ?
भौतिक-आध्यात्मिक
यज्ञ रचा लूँ ,
दे दे के तू ने जताया नहीं
बिन माँगे मिल गया
करूँ देव पूजा सङ्गती करण
करूँ दान, मिला जो तेरे
वाज से
मुझे दे दे आशीष तेरा
तेरे बिन कौन भरेगा?
मेरे खाली खांखर झोले
जग तेरा सारा,
दान से बना है
दान तेरा चारों ओर से खिला है
जल वायु अग्नि
आकाश धरती
जो चाहा हमने सब
इनसे मिला है
मुझे देह मिला तेरा स्नेह मिला
जो चाहा मिल गया
अब जीवन में अमृत भर दे
चरणों में गिर गया
आज से
अमृत का जो रस घोले
रस भरे जीवन में
हुआ धन्य, यह मन बोले
तेरे बिना प्रभु,
रहूँगा कैसे
चारों ओर छाई तृष्णा
विषय-विषों से,
बचूँगा कैसे ?
जब तक ना लूँगा,
तव कृपा
हृदय के भीतर,
अमृत कलश है,
फिर भी ये जीवन,
क्यों जस का तस है
मिले क्यों ना प्रेरित पन्य प्रज्ञा आपसे
प्रभु मन में ही बस जाना
पल-पल कहे मेरा मन
परमार्थ का हो जाना










