तीनों कालों का जिसे पूरा यथावत् ज्ञान है

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तीनों कालों का जिसे पूरा यथावत् ज्ञान है

तीनों कालों का जिसे
पूरा यथावत् ज्ञान है
सृष्टि सारी में प्रतिष्ठित
बस वही भगवान् है
है परम सुखरूप केवल
मुक्तिदाता नाम है
उस अनादि ब्रह्म को
श्रद्धा सहित प्रणाम है

संसार के वाली ने
संसार रचाया है
संसार रचाया है
कण कण में समाया है

पतझड़ में बहारों में
फूलों में खारों में
तेरा रूप झलकता है
रंगीन नजारों में
भँवरों की गुंजारों ने
कैसा गीत सुनाया है

कहीं निर्मल धारा है
कहीं सागर खारा है
कहीं गहरा पानी है
कहीं दूर किनारा है
जगदीश तेरी महिमा
कोई जान न पाया है

कोई चार के कन्धों पर
दुनिया से जाता है
कोई ढ़ोल बजा कर के
बारात सजाता है
“बेमोल” ये सृष्टि का
कैसा चक्र चलाया है

संसार के वाली ने
संसार रचाया है
संसार रचाया है
कण कण में समाया है