टंकारे में छोड़ के चल दिये

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टंकारे में छोड़ के चल दिये (धुन-काली कम्बली ओढ़ के)

टंकारे में छोड़ के चल दिये
स्वामी जी परिवार को।
मार्ग बतलाने भूले संसार को।। टेक ।।

धर्म कर्म का ध्यान नहीं था,
हम हैं कौन कुछ ज्ञान नहीं था।
हृदय में स्थान नहीं था,
सत्य अहिंसा प्यार को ।।1।।

चलते थे पर डरे हुए थे,
जीते थे पर मरे हुए थे।
दिल दिमाग में भरे हुए थे,
अविद्या के अन्धकार को।।2।।

अविद्या का अन्धकार मिटाने,
वेदों का प्रकाश फैलाने ।।
पाखंडियों का टोल भगाने,
दृढ़ कर चले विचार को ।।3।।

अनगिन आपत्ति व्याधायें,
राह में मिली बड़े त्रास दिखाये।
प्रेमी फिर भी ना घबराये,
धन्य महर्षि उदार को।।4।।