स्वतन्त्रता मिटने का डर भयभीत हुआ जन-जन है।
स्वतन्त्रता मिटने का डर
भयभीत हुआ जन-जन है।
आर्य वीरों उठो देश का
तुम को आह्वान है॥ टेक ॥
डूब गया है राष्ट्र सभी अब
फिर विलास के तम में।
नाच रही पश्चिम से आयी
संस्कृति हृदय हरम में॥
सुबक रही मानवना
नैतिकता बैठी है गम में।
अन्याइयों का करें सामना
साहस रहा ना हम में॥
भौंरों का सर झुका और
जोरों पर सांझ सघन है॥1॥
ठौर-ठौर पर जाल
जाहन्वी में रहे डाल मछेरे।
मन मृग सर्पों से वश में
करने को विकल सपेरे॥
इस बेला तुम अगर न
चेते शौर्य शक्ति से प्रेरे।
तो भारत भर को अन्धा
करदेंगे श्वेत अन्धेरे॥
मादकता अश्लीलता अन्दर
भर रही कायरपन है॥2॥
दलित शोषितों की व्याकुल
चीत्कार अभी बाकी है।
आस्तीनों के सांपों की
फुफकार अभी बाकी है।
मन को पराधीनता का
अंधियार अभी बाकी है।
अपने ही घर में मीना
बाजार अभी बाकी है।
युग चारण कवियों का
सत्ता करवाती ताड़न है॥3॥
राजनीति का खेल राष्ट्र
का वक्ष विदार रहा है।
काश्मीर हो अलग भाव
जगा कोई गद्दार रहा है।
गुण्डों से पीड़ित जन-जन
कर हा हा कार रहा है।
धर्मान्तरित व्यथित
मिनाक्षीपुरम पुकार रहा है।
छेड़ी जाती केरल की
महिलाओं का कुन्दन है॥4॥
रणधीरों आवो फिर से
काटो अनीति जंगल को।
निज प्रताप से मेटो
भ्रष्टाचारी के दलदल को॥
देता हूं आवाज अन्धड़ों को
दारुण हलचल को।
राणासांगा जयमल फत्ता
को गोरा बादल को॥
अन्याइयों के काराग्रह में
किरणों का बन्धन है॥5॥










