स्वर्ग धरती का कश्मीर है

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स्वर्ग धरती का कश्मीर है

स्वर्ग धरती का कश्मीर है
महकती जिसकी खुश्बू से वादी।
ख्वाबों की हिन्द के ताबीर है
आग इस घर में किसने लगादी॥
देख बर्फीली चट्टानों को
नजरें रहजां गड़ी की गड़ी।


मानो लगता दुल्हन चाँदी की
नभ में औढ़े चुनरिया खड़ी॥
झलके घूंघट से कोई हीर है,
याद भारत ने जिसकी भुलादी॥1॥

वृक्ष अखरोट बादाम के झूमता है
कहीं पर चिनार।
केसर की सज रही क्यारियां
कहीं सेबों पै आई बहार ॥
निर्मल डलझील का नीर है,
पर चेहरों ने खुशियां गवांदी॥2॥

धब्बे बर्फीली चट्टानों पर
खून के आज लगने लगे।
भूलों से अपनी ही खिलते
फूल शूल बनकर के चुभने लगे॥
उजड़े धर सीनों में पीर है,
शमां महफिल की खुद बुझादी॥3॥

लीडरा ने वतन धमकियाँ
सुनते ही जाने क्यों डर गये।
रुबिया के लिए एकदम
कातिलों को रिहा कर गये ॥
मुफ्ती मौहम्मद की एक तकसीर है,
अपने पदकी गरीमा घटादी॥4॥

वक्त जो जा चुका जा चुका
अब आगे संभल कर रहो।
अंग भारत का है धारा
तीन सौ सत्तर बदल कर रहो ॥
‘कर्मठ’ यह आखरी तीर है
चूको ना खतरे में है आजादी॥5॥