स्वयं को भी ना जो समझे
स्वयं को भी ना जो समझे
वो यह संसार क्या जाने।।
परिदें है अन्धेरों के भला
उजियार क्या जाने।।
चटोरे है जुबानो के
मारते बेजुबानो को,
शराबो में जो डूबे है वो
सद् आचार क्या जाने ।।१।।
सदा छलते है मन अपना
कुटिल चालो को चल चलकर,
चढ़े है नाव में बेशक मगर
पतवार क्या जाने ।।२।।
पराये धन के गिद्धो का
नही ऐतबार होता है,
जला देते है दुल्हन को
बहु का प्यार क्या जाने ।।३।।
अजी बेजान पत्थरों में
दृढ़ते फिरते है उसको,
बुतों पर सिर पटकने से
प्रभु का व्दार क्या जाने ।।४।।
कदम के साथ कदमों से
सुरेन्द्र चल नही सकते,
जगत के इस बगीचे को
एक परिवार क्या जाने।।५।।










