सूरज बन दूर किया जिसने, पापों का घोर अन्धेरा।
सूरज बन दूर किया जिसने,
पापों का घोर अन्धेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।।1।।
मथुरा नगरी से उदय हुआ
गुरु विरजानन्द का चेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।।2।।
गुरुवर को जो वचन दिया,
प्राणों के साथ निभाया।
परोपकार में ही उसने,
अपना सर्वस्व लगाया।।
तज भूख-प्यास सरदी गरमी,
नहिं देखा साँझ सवेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।।3।।
छूतछात और भेदभाव के,
लाखों थे मतवाले।
भोली-भाली जनता को,
डसते थे विषधर काले ।।
वेद की वीणा बजाके सबकी,
कर दिया मस्त सपेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।।4।।
लाखों-करोड़ों दुःखी दिलों का,
दर्द था जिसके दिल में,
ईंटें खाई, जहर पिया,
हँसता ही रहा मुश्किल में।
जिसके बदौलत सत्य धर्म ने,
डाला फिर से डेरा।।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।।5।।
हर मजवून पै देते थे,
वे बड़ी-बड़ी तफसीलें।
सिन्धु से गहरी,
नभ से ऊँची गिरि से सुदृढ़ दलीलें ।।
जिसने ‘पथिक’ दुनियाँ भर में,
मानवता का रंग बिखेरा।
वह देव दयानन्द मेरा।
वह देव दयानन्द मेरा ।।6।।
“धन एक वस्तु है जो ईमानदारी और न्याय से कमाई जाती है। इसका विपरीत है अधर्म का खजाना।” – ऋषि दयानन्द










