सुन प्यारे सुन, तज बुरी धुन
सुन प्यारे सुन, तज बुरी धुन,
कल्याण जिसमें उस ही रास्ते को चुन,
सुन प्यारे सुन॥ टेक ॥
काशी गया में भटके क्यों तू बृन्दाबन में।
प्रियतम मिले ना जब तक मैल है मन में॥
मन में तो भरा तेरे पाप का विकार है।
तजदे विकार को तू प्रभु से जो प्यार है॥
खाये जा रहा है तुझको बुराइयों का धुन॥1॥
मारा ना मन को बनकर बैठा वैरागी।
खाक भी रमाई मोह माया ना त्यागी ॥
साधना को छोड़ साधन कमाई के कर रहा।
लोभ में फंसा है लूट लूट झोली भर रहा॥
लम्पट वैरागी माफ हो ना अवगुना ॥2॥
मन्दिरों में लूट ठगते घाटों पै पण्डे।
हर-हर गंगे बोलें गाड़े बैठे हैं झण्डे॥
मुर्दों के हाड़ राख जल में बहाई थैली।
पापियों के पाप ने तो गंगा भी करदी मैली॥
कैसे दूर होगा गंगा मैय्या का प्रदूषण ॥3॥
भेष तो फकीरी कपट का आडम्बर है।
नाम साधना के मन्दिर वासना के घर हैं।
आश्चर्य कर्मठ कैसा इन्द्रिय दमन है।
योगियों का हो रहा रमणियों में रमण है॥
करते हैं पाप पापी कहते हैं पुण्य॥4॥










