सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय।
सुखी बसे संसार सब,
दुखिया रहे न कोय।
यह अभिलाषा हम सब की,
भगवन् पूरी होय ॥
विद्या-बुद्धि-तेज-बल,
सब के भीतर होय।
दूध-पूत-धन-धान्य से,
वंचित रहे न कोय ॥
द्विज वेद पढ़ें सुविचार बढ़े,
बल पाय चढ़ें नित ऊपर को।
अविरुद्ध रहें, ऋजु पंथ गहें,
परिवार कहें वसुधा-भर को।
ध्रुव धर्म धरें, पर दुःख हरें,
तन त्याग तरें भवसागर को।
दिन फेर पिता, वर दे सविता,
कर दे कविता कवि ‘शंकर’ को।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या दविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
ओं सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ओं तेजोऽसि तेजो मयि घेहि वीर्यमसि
वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेहि
ओजोऽस्योजो मयि धेहि
मन्युरसि मन्युं मयि धेहि
सहोऽसि सहो मयि धेहि ॥
ओं असतो मा सद्गमय तमसो मा
ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमयेति।
ओं शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥










