सुख के अभिलाषी, प्राणी को भगवान्

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सुख के अभिलाषी, प्राणी को भगवान्

सुख के अभिलाषी
प्राणी को भगवान्
भुलाना ठीक नहीं,
सीधे पथ जाने वाले को
उलटे पथ जाना ठीक नहीं।।

सम्भव है मानव भूल करे
इसका फल-संकट भोग मिले।
परिणाम मिले जब करनी का
तो फिर घबराना ठीक नहीं।।

माना यह घड़ियां आती हैं
उत्थान पतन की जीवन में।
उत्थान पतन की घड़ियों में
कोई भेद जताना ठीक नहीं।।

आदेश यही समदर्शी का
हर काल में जीव सम रखना।
स्वामी के सच्चे सेवक को
आज्ञा ठुकराना ठीक नहीं।।

सुख चाहते हैं यदि देश सभी
तो बात खरी यह कहते है।
रोते आए इस दुनियां में रोते
अब जाना ठीक नहीं।।

देकर भूल जाओ,
किन्तु लेकर कभी न भूलो।