सुध बिसर गई आज,तेरे मिलन की
ओ३म् मा नो॑ अग्ने स॒ख्या पित्र्या॑णि॒ प्र म॑र्षिष्ठा अ॒भि वि॒दुष्क॒विः सन् ।
नभो॒ न रू॒पं ज॑रि॒मा मि॑नाति पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रधी॑हि ॥
ऋग्वेद 1/71/10
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
दशा जानते हो,
विकल मेरे मन की
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
हम हो गए हैं
पराशीर्ण अब तो
अभिन्न सखा बन के
हे दाता ! बल दो
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
आत्मबल, मनोबल का
सद्गुण-सौंदर्य
नष्ट हो रहा है ये
सत्य-तप का ऐश्वर्य
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
तन का बुढ़ापा
जब होगा तब होगा
मन का बुढ़ापा
जो आया क्या होगा
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
हे अग्ने प्रभुवर !
क्यों आते नहीं तुम
क्या हम सर्वनाश में
हो जाएँगे गुम ?
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
आ जाओ
अभिशस्ति से पहले आओ
कर दो उद्धार
ना व्याकुल बनाओ
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
दशा जानते हो,
विकल मेरे मन की
सुध बिसर गई आज,
तेरे मिलन की
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *
राग :- हेमन्त
गायन समय रात्रि का दूसरा प्रहर
ताल झपताल १० मात्रा
धिं ना धिं धिं ना – तिं ना धिं धिं ना
शीर्षक :- पैतृक मित्रता का निर्वाह करो
वैदिक भजन९५२वां










