सोते नै तो बोल जगादे

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सोते नै तो बोल जगादे

सोते नै तो बोल जगादे,
जागे ने जगावै कौण।
रै बिन सुणे जगत्
मैं गुण ज्ञान बतावै कौण ॥

शिक्षा मिलती तीन किस्म
से रही खटक ‘वैद्य मंगल’ कै।
गुरु बणा कै या धन देके,
या विद्या संग बदल कै॥
जो मरते हैं बोझ अक्ल कै,
उसको समझावै कौण-रै बिन….।

समझदार मानस कै सुनकै,
कोए बोल मर्म का गड़ण्या।
सत्संग और स्वाध्याय करके,
गुण ज्ञान चौगुना चढ़ज्या ॥
बन्दर, तोता, मैना पढ़ञ्ज्या,
कौवे पढ़ावै कौण-रै बिन….।

काफी हो सै करा इशारा,
नर-नार चतुर सुगड़ को।
काला अक्षर भैंस बराबर,
मन्दबुद्धि नंग परड़ को।
उल्लू, कोतरी, चमगादड़ को,
प्रकाश दिखावै कौण…..।

अच्छी बात समझ मैं आज्या
गुण कर्म स्वभाव हों सोले।
जिसका नाश नजदीक लागरा,
वे सदा चालते ओले।
खा ना जानै भेड़ बिनौले,
घी-खाण्ड खुवावै कौन-रै बिन….।