शुभ अशुभ जाने अनजाने
शुभ अशुभ जाने अनजाने,
कर्म का फल भोगने के लिये
हमने अनगिन जन्म लिये।
परमेश्वर की न्याय व्यवस्था,
सदा अटल, भोग रहे सब,
जैसे जिसने कर्म किये। टेक।
प्रकृति सत् जीव सत् चित्
सत चित आनन्द,
ईश्वर नित्य, तीन ये संत्तायें ।।
सृष्टि क्रम में करती
आ रही रचनायें ।।
अनादि काल से भोग,
भोगता में हलचल,
देख रहे सब उथल-पुथल में,
बदल ठिये।। 1।।
पाप और पुण्य बराबर,
ईश्वर की न्याय तुला पर
जब हो जाता हैं।
तभी जीव मानव का,
चोला पाता हैं।
जिसके पुण्य कमजोर,
पाप हो गये प्रबल,
अधो गति योनि में,
जीव वह पटक दिये।।2।।
कह रहा पातंजल योग,
जाति और आयु भोग,
पहले कर्मों अनुसार प्राप्त हैं
सब जीवों को,
जन्म सिद्ध अधिकार ।।
कर्म क्षेत्र में कोई गिरा,
कोई रहा सम्भल,
कोई जिन्दा ही मरे,
कोई मर कर भी जिये ।। 3।।
निज कर्त्तव्य का पालन,
है जीवन का संचालन,
यह जिम्मेदारी।
तत्परता से नित्य
निभायें नरनारी।।
सम्भल-सम्भल
चल हो जायेगा,
उद्देश्य सफल,
मत विह्नल हो प्रेमी
दृढ़ता धार हिये।। 4।।










