श्री साधु अजरानन्द

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श्री साधु अजरानन्द : ग्राम मदीना का उजाला

ग्राम मदीना दाँगी, जिला रोहतक का एक प्रकाशपुंज व्यक्ति साधु अजरानन्द था। समाज में सुधारक विचार रखने वाले इस महापुरुष को ग्रामीण “उजाला” के नाम से जानते थे। वे अपने विचारों, सरल जीवन और समाज सेवा के लिए सबके प्रिय बने।

हिन्दी सत्याग्रह के दौरान उन्होंने भी स्वेच्छा से भाग लिया और अंततः शहादत प्राप्त की। उनका वास्तविक नाम भी अजरानन्द ही था। उनकी समाधि आज भी मदीना ग्राम में नहर के किनारे स्मारक स्वरूप बनी हुई है, जो उनके बलिदान की अमर गवाही देती है।

हिन्दी सत्याग्रह और अजरानन्द जी का बलिदान

हिन्दी सत्याग्रह की शुरुआत 30 मई 1957 को चण्डीगढ़ से सद्भावना यात्रा के रूप में हुई, जो 9 जून तक अर्थात् 11 दिन निरन्तर चलती रही। इसके बाद 10 जून से 18 दिसम्बर तक पूरे 6 मास 18 दिन तक यह आन्दोलन जारी रहा।

इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ सत्याग्रह इतने लंबे समय तक अहिंसक और शान्तिपूर्ण ढंग से चला हो, जबकि सत्याग्रहियों पर सरकार द्वारा अकथनीय अत्याचार किये गये।

हरियाणा प्रान्त के अनेक वीरों ने इसमें शहादत दी, जिनमें साधु अजरानन्द का योगदान और बलिदान विशेष रूप से स्मरणीय है। वे आज भी हिन्दी और समाज सुधार की अलख जगाने वाले “ग्राम मदीना का उजाला” कहे जाते हैं।