श्री रामचन्द्र ने आजीवन, प्रिय वैदिक पथ को अपनाया।

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श्री रामचन्द्र ने आजीवन, प्रिय वैदिक पथ को अपनाया।

श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ को अपनाया।
नहीं वेद विरुद्ध किसी का भी,
उद्बोधन उनके मन भाया।।
निज पूज्य पिता की व्रत रक्षा को,
राम सहर्ष गये वन में।

राज्य का लोभ, वन का संकट,
विक्षोभ न कर पाये मन में।
अनुव्रतः पितुः पुत्रः श्रुति का,
पालन करके था दिखलाया।
अपने सम्मानित पिता सदृश,
सत्य को स्वयं भी अपनाया।
भौतिक भोगों का चाकचिक्य नहीं,
उनको चंचल कर पाया।।
श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ…….

माता में तथा विमाता द्वय में,
उनकी अनुपम समता थी।
देखी नहीं कभी किसी ने भी,
उनमें व्यवहार विषमता थी।
मात्रामवतुसंमाना श्रुति के,
वे अद्वितीय आदर्श रहे।

मातृभक्ति के शुभरणहित,
उन्होंने क्लेश सहर्ष सहे।
किसी विमाता तक के प्रति,
नहीं कुटिलभाव मन में आया।।
श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ…….

नहीं कभी भाई के प्रति,
मन में दुर्भाव पनप पाया।
सबको समान सम्मान मिले,
बस यही मार्ग उनको भाया।

भाईयों के हित में लगा रहा,
उनका अपना सारा जीवन।
‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्’,
यह सफल कर दिया वेद वचन।
सर्वदा भाईयों का गुणगान,
सबके समक्ष सादर गाया।।
श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ…..

सर्वथा एक पत्नी व्रत ही,
पालन कर उसने दिखलाया।
पत्नी के दुःखप्रद रावण को मारा,
सब जग को सिखलाया।

‘धर्मणाहं गृहपतिस्तव’
इस वैदिक प्रण के रक्षक थे।
जो वेद विरुद्ध चले उनके,
सब भाँति सर्वदा भक्षक थे।
पर पत्नी को जननी समान,
जीवन भर मनवाया।
श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ…….

अन्यों की वसुधा पर वैभव,
कर सका उन्हें आकृष्ट नहीं।
रावण की सफल सम्पदा भी,
कर पायी मन को भ्रष्ट नहीं।
‘मागृधः कस्यस्विद्धनम्’
वचन यह श्रुति का था, उसने पाला।
जीवन से भी रही उन्हें अधिक प्रिय,
वैदिक मर्यादा माला।
‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहकर,
उनको सारा जग हर्षाया।
श्री रामचन्द्र ने आजीवन,
प्रिय वैदिक पथ ही अपनाया।।