शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
जल में, थल में और गगन में
अन्तरिक्ष में, अग्नि पवन में
औषधि वनस्पति वन उपवन में
सकल विश्व में जड़-चेतन में
शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
ब्राह्मण के उपदेश वचन में
क्षत्रिय के द्वारा हो रण में
वैश्य जनों के होवे धन में
और शूद्र के हो चरणन में
शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
शान्ति राष्ट्र निर्माण सृजन में
नगर ग्राम में और भवन में
जीव मात्र के तन में मन में
और जगत् के हो कण-कण में
शान्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
स्वर :- श्रीमती अदिति जी शेठ
प्रस्तुत भजन निम्न वेद-मन्त्र का पद्य-भाव-अनुवाद है :–
ओ३म् द्यौः॒ शान्ति॑र॒न्तरि॑क्ष॒म् शान्तिः॑ पृथि॒वी शान्ति॒रापः॒ शान्ति॒रोष॑धयः॒ शान्तिः॑ । वन॒स्पत॑यः॒ शान्ति॒र्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वम् शान्ति: शान्ति॑रे॒व शान्तिः॑ सा मा शान्तिरेधि ॥ यजुर्वेद 36/17॥










