शक्तिशाली हो प्रभु तुम !

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शक्तिशाली हो प्रभु तुम !

शक्तिशाली हो प्रभु तुम !
हो पवित-पवमान सदा
कर दिया गतिमान जगत् को
विश्वव्यापी तेरी प्रभा !
शक्तिशाली हो प्रभु तुम !

अन्नमय है कोष शारीरिक
प्राणमय प्राणायाम विधि
कोष है मनोमय मानसिक
विज्ञानमय है यज्ञाग्नि
कोष आनन्द का अग्नि स्वयं है
सोम-स्रोत है भक्त का
शक्तिशाली हो प्रभु तुम !

सोम-सवन होता साधक याज्ञिक
यज्ञ करे परिपक्व उसे
प्रभु-परिष्कृत, रस को पीता
प्रभु बनाते सत्व उसे
हो जाना परिपाक ही तो,
रूप है परिष्कार का
शक्तिशाली हो प्रभु तुम !

हे प्रभु ! ब्रह्माण्ड तुम्हारा
वेद-वाणी के वेत्ता तुम
मलिनता का स्थान कहाँ फिर ?
क्यों ना बने याज्ञिक ही हम
हे मेरे ब्रह्मणस्पति
पुत्र हूँ मैं, ब्राह्मण तेरा
शक्तिशाली हो प्रभु तुम !
हो पवित-पवमान सदा
कर दिया गतिमान जगत् को
विश्वव्यापी तेरी प्रभा !
शक्तिशाली हो प्रभु तुम !