वाममुद्य संवितर्वाममु श्वो द्विवेद॑िवे वा॒मम॒स्मभ्यं सावीः ।
वामस्य हि क्षय॑स्य देव॒ भूरि॑रया धिया वामभार्जः स्याम
तर्जः मूर्ति अशी साजरी ग उठावरी बांसुरी
साधक के सद्गुणों की प्राप्ति हेतु, प्रेरणा की
है याचना सविता देव!
सर्वगुण सर्जक हो, सर्वगुण प्रेरक हो
सारे जगत में एकमेव
एक गुण की करें आज से कामना (2)
दे दो सौन्दर्य हे वामदेव !
सत्य-शिव भी यहाँ है अभेद ॥
॥ साधक के॥
सौन्दर्य श्रेष्ठ जहाँ सत्य शिव साथ हो (2)
निस्वार्थ सेवित जो हो,
आजकल प्रतिदिन ये सौन्दर्य प्राप्त हो
जिसमें प्रशस्त भाव हो
दानादि गुण-समपन्न, हे गुणोध-दाता (2)
गुणी करते हमें निःसंदेह
सत्य शिव भी यहाँ हैं अभेद
॥ साधक के॥
प्रज्ञा और कर्म दोनों सौन्दर्य-सेवी हों (2)
मन बुद्धि कर्म हों सुन्दर,
सत्य अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य-प्रेमी होवें
तथाविध होवें प्रवर
सविता देव हैं सृष्टा सौन्दर्य के (2)
करो सर्वांग-सुन्दर अछेह॥
सत्य शिव भी यहाँ हैं अभेद॥
॥ साधक के ॥
(अभेद) समरूप, अविभक्त। (सेवित्) सेवा किया गया। (प्रशस्त) प्रशंसनीय। (गुणोष)
गुणों का समूह। (प्रज्ञा) मेधा, समझ, बुद्धिमत्ता। (प्रवर) श्रेष्ठ। (अछेह) निरन्तर, हमेशा।










