सत्संग वाली नगरी चल रे मना

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सत्संग

सत्संग वाली नगरी चल रे मना,
पी सज्ञान का जल रे मना,
सत्संग वाली नगरी…. (1)

इस नगरी में ज्ञान की गंगा,
जो भी नहाए जो जाए चंगा,
मल मल हो निर्मल रे मना,
सत्संग वाली नगरी ….. (2)

सत्संग के है अजब नजारे,
बहुत सुहाने बहुत ही प्यारे,
पा सुख-शान्ति का फल रे मना,
सत्संग वाली नगरी….. (3)

सत्संग का ये असर हुआ है,
बाहर सब कुछ बदल गया है,
तू अन्दर से बदल रे मना,
सत्संग वाली नगरी…….. (4)

सत्संग का तो फल है निराला,
मन मंदिर में करके उजाला,
कर जीवन को सफल रे मना,
सत्संग वाली नगरी …… (5)

किस्मत का चमका है सितारा,
उदय हुआ है भाग्य हमारा,
अवसर जाये ना निकल रे मना,
सत्संग वाली नगरी…. (6)

चल रे ‘पथिक’ शुभ कर्म कमा ले,
इस अवसर से लाभ उठा ले,
देर ना कर इक पल रे मना,
सत्संग वाली नगरी….. (7)