सत्संग
सत्संग ही स्वर्ग का द्वार है।
चारों वेदों का यही सार है।।
सत्संग ही मानव को उठाता है,
बुरी संगत से बचाता है।
दूर हो जाता हर विकार है,
मन में जो आता सद् विचार है।।
सत्संग ही स्वर्ग का ……….
जीवन में यश वह पाता है,
मान और अपमान त्याग जाता है।
करते रहना बस परोपकार है,
इससे ही होगा बेड़ा पार है।।
सत्संग ही स्वर्ग का……….
प्रभु भक्ति से शक्ति मिलती है,
दिल की मुरझाई कली खिलती है।
ईश्वर की माया अपरम्पार है,
क्योंकि वो प्रभु सर्वाधार है।।
सत्संग ही स्वर्ग का ………….
नर-तन शुभ कर्मों का फल है,
मिलना इसका नहीं सरल है।
‘सत्यम्’ का सही ये विचार है,
ओ३म् ही सबका प्राणाधार है।।
सत्संग ही स्वर्ग का ……..










