सरशैया पर भीष्म पितामह बिता रहे
सरशैया पर भीष्म पितामह बिता रहे
जब जीवन शेष।
धर्म अधर्म जन्म मृत्यु पर देने लगे
एक दिन उपदेश ।।
भोगता जीव भुगाता ईश्वर
भोग प्रकृति जीवन भोग,
स्थूल शरीर से जीव का है संयोग जन्म,
मृत्यु वियोग।
चित्त की वृत्ति किलिष्ट रोग,
अभ्यास से काटो सकल क्लेश ।1।
आनन्द उत्साह निर्भयता हो
जिसमे उसे धर्म समझो,
लज्जा भय शंका हो जिसमें
उसको पाप कर्म समझो।
क्या कह रहा मर्म समझो,
अन्दर अन्तर्यामी भुवनेश।।2।
तन से मन से और वचन से
कभी ना पापा चरण करो,
धर्म की रक्षा करने के लिये
पापी के प्राण हरण करो।
प्रण यह चारों वर्ण करो,
कि धर्म की रक्षा करें हमेश।।3।
शोभाराम प्रेमी आश्चर्य चकित
यह बातें सुनकर,
द्रुपद सुता कृष्णा फुंकारी
नागन की तरह सिर धुन कर।
बोली क्रोध में जलभुन कर,
धर रूप भयंकर बिखरे केश।।4










