सारे जगत् में प्रभु ने मधु सोमरस बहाया
सारे जगत् में प्रभु ने
मधु सोमरस बहाया
साँसों की ताल लय से
हृदय में सुर सजाया
सारे जगत् में प्रभु ने
निर्झर अनन्त काल से
यह सोम बह रहा है
आनन्द विभोर होकर
मन प्रभु से कह रहा है
प्राणेश कैसा अनुपम!
सात्विक आनन्द छाया !
सारे जगत् में प्रभु ने
मधु सोमरस बहाया
सहस्त्रधारा इसकी
और रूप अनगिनत हैं
हर रोम-रोम जगत् का
आनन्द में निरत है
आराध्य इन्द्र से यह
सौन्दर्य कैसा पाया
सारे जगत् में प्रभु ने
मधु सोमरस बहाया
यह अन्तराल नभ के
सौरभ भरे पवन से
मदिरा पिलाये घन को
निर्झर बहे गगन से
तरसी हुई धरा पर
यह उदार जल बरसाया
सारे जगत् में प्रभु ने
मधु सोमरस बहाया
अहंकार यह विषैला
मन में ना घर करेगा
यह पवित्र मन विलय हो
विश्वात्मा में रहेगा
आतुर स्वरों से अन्तर
आलोक जगमगाया
सारे जगत् में प्रभु ने
मधु सोमरस बहाया
साँसों की ताल लय से
हृदय में सुर सजाया
सारे जगत् में प्रभु ने










