सारा जहाँ रचाकर, हे प्रभु कहाँ छुपा है।
तर्ज – मेरे दिल में आज क्या है……
सारा जहाँ रचाकर,
हे प्रभु कहाँ छुपा है।
हम ढूंढ़ कर भी हारे,
तू कहीं नहीं मिला है।
संसार में करिश्में,
दिन रात तू दिखाता तेरे
‘सचिन’ नज़ारें,
जग में बरमला है
सारा जहाँ रचकर……
कहते हैं इस जहाँ के,
कण-कण में तू समाया आता
कहीं नज़र ना, शिकवा
ये ही गिला है सारा जहाँ रचकर……
महिमा तेरी निराली,
पंछी भी गा रहे हैं
अ-हमनशीं बतादे,
तू क्यूँ बेनिशाँ है
सारा जहाँ रचकर……
दाता मेरे दयालू,
तुझे देखना मैं चाहूँ
पर देख ना मैं सकता,
ये भी मुझे पता है
सारा जहाँ रचकर……










