सत्संग
सन्तों की संगत में जो,
नित नियम से जाएगा।
भव सागर के कष्टों से,
वह छुटकारा पाएगा।।
ये मन निर्मल करे,
और शुद्ध भाव भरते,
दुर्गुण मिटाकर के,
गुणी ज्ञानवान करते।
ऐसी रंगत में कौन,
नहीं रंगना चाहेगा।।
सन्तों की संगत में जो नित……
संसार में सुख-दुःख,
है साथ ही रहते,
कर्मानुसार मिलते,
और हम उनको सहते।
उस परम प्रभु के न्याय से,
कोई बच न पाएगा।।
सन्तों की संगत में जो नित……
मानव कहता मन पर,
मेरा अधिकार नहीं है,
पर योगी को यह बात,
स्वीकार नहीं है।
योग विद्या पर चलने से ही,
मन वश में आएगा।।
सन्तों की संगत में जो नित……..
जितनी मलिनता है,
उतना समय लगेगा,
जन्मों-जन्मों का संस्कार,
यूं ही नहीं मिटेगा।
शुद्ध आत्मा करके,
अवगुण जो हटाएगा।।
सन्तों की संगत में जो नित………
झूठे जग के रिश्ते,
ना कोई तुम्हारा है,
वह’ ओ३म्’ नाम ही तो,
बस एक सहारा है।
कोई जानन हारा ही तो,
ये ज्ञान कराएगा।।
सन्तों की संगत में जो नित……..










