साँसों की तार तार में, प्रभु प्यार को पिरो लो

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साँसों की तार तार में , प्रभु प्यार को पिरो लो

साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो
शुभ कर्म करके पुण्य का
अन्तर में बीज बो लो
साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो

ज्ञानी की ये निशानी
मीठी सी उनकी वाणी
मीठे से बोल में है
प्रभु की दरस सुहानी
बोलो तो मीठे बोल ही
अमृत हृदय में घोलो
साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो

बीती का गम सुना कर
वो मिट गया अँधेरा
खुलती यहाँ से आँखें
होगा वहीं सबेरा
तेरे द्वार प्रभु का द्वार
अन्तर से नेत्र खोलो
साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो

जीवन का एक एक पल
अनमोल है खजाना
इनमें से एक भी पल
नहीं लौट के है आना
आनन्द रस से अपना
अन्तःकरण भिगोलो
साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो

शुभ कर्म करके पुण्य का
अन्तर में बीज बो लो
साँसों की तार तार में
प्रभु प्यार को पिरो लो

स्वर :- श्री दिनेश जी भट्ट (मालपुरा राजस्थान)

साँसों की तार तार में (1) :– वायुमारोह धर्मणा (धर्मणा वायुम् आरोह) सामवेद 483 अर्थात् कोई श्वास भक्तिरस से रिक्त न रह जाए।

मीठी सी उनकी वाणी (2)
बोलो तो मीठे बोल ही (2) :–
(क) :- तुलना कीजिये यजुर्वेद मन्त्र 11/07 – “वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु” अर्थात् वेदज्ञान का अधिपति प्यारा परमेश्वर ! हमारी वाणी को मधुर करे |
(ख) :- तुलना कीजिये ऋग्वेद मन्त्र 2/21/6 “स्वाद्मानम् वाच: सुदिनत्वमह्नाम्” अर्थात् हे परमेश्वर ! वाणी की मिठास, वाणी का माधुर्य दिनों का सुदिनत्व प्रदान कर
सादर नमस्ते जी
विदुषामनुचर
विश्वप्रिय वेदानुरागी