संसार मुसाफ़िरखाना है

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संसार मुसाफ़िरख़ाना है

(तर्ज-है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत…..)

संसार मुसाफ़िरखाना है इसका दस्तूर पुराना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़ यहाँ से जाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़…..

१. यहाँ बड़े बड़े विद्वान् हुए धनवान हुए बलवान हुए।
सम्राट हुए परिव्राट हुए व्यवहार कुशल इनसान हुए।
पर आज किसी का दुनियाँ में मिलता नहीं ठौर ठिकाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रो…………

२. यहाँ मुर्शद पीर फ़कीर पैग़म्बर देवपुरुष अवतार हुए।
ऋषियों मुनियों हठियों तपियों गुरुओं के भी दीदार हुए।
उपदेश सुनाकर लौट गये इनका इतना अफ़साना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़…….

३. यहाँ रावण कुम्भकरण उपजे हनुमान लखन श्रीराम हुए।
हुए कंस करण दुर्योधन भी भीष्म अर्जुन घनशाम हुए।
केवल इतिहास के पन्नों में शब्दों के तीर चलाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़……….

४. हर रोज़ मुसाफ़िरख़ाने में कुछ नये मुसाफ़िर आते हैं।
आराम किया विश्राम किया मिलजुल कर वक्त बिताते हैं।
जन जन ने जन जन को जाना जन जन फिर भी अनजाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़………..

५. कितना ही वैभवशाली हो दुनियाँ इसकी जागीर नहीं।
दो चार दिनों की रंगत है किसकी बदली तस्वीर नहीं।
जब खेल तमाशा ख़त्म हुआ किसने किसको पहचाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़……….

६. हालात बदलती दुनियाँ में जो आया है वह जायेगा।
यह अटल नियम है कुदरत का फिर कौन सदा रह पायेगा।
हर ‘पथिक’ यहाँ पर अपना है और हर अपना बेगाना है।
इक रोज़ यहाँ पर आना है इक रोज़……….