भजन – ९१
संसार के वाली ने संसार रचाया है
संसार रचाकर के, कण-कण में समाया है ॥
संसार के…..
कहीं निर्मल धारा है,
कहीं सागर खारा है।
कहीं गहरा पानी है,
कहीं दूर किनारा है।
जगदीश तेरी महिमा
कोई जान न पाया है।
संसार रचाकर के,
कण-कण में समाया है ॥
संसार के…..
पतझड़ में बहारों में,
फूलों में और खारों में।
तेरा रूप झलकता है,
रंगीन नजारों में।
भवरों के गुंजारों ने
कैसा राग सुनाया है।
संसार रचाकर के,
कण-कण में समाया है ।
संसार के…..
कोई चार के कंधों
पर दुनियां से जाता है।
कोई ढोल बजाकर के
बारात सजाता है।
बेमोल सृष्टि का
कैसा चक्र चलाया है।
संसार रचाकर के,
कण-कण में समाया है ॥
संसार के….










