संसार के बाली ने संसार रचाया है।
संसार के बाली ने
संसार रचाया है।
संसार रचाया है कण
कण में समाया है।
गर दूं पे सितारों में
कैसी चमक निराली है,
महताब में ठंडक है
और शम्स में लाली है,
कहीं श्याम घटाओं ने
कैसा जल बरसाया है। ।१।।
पतझड़ में बहारों में
फूलों में खारों में,
तेरा रूप झलकता है
रंगीन नजारों में,
भंवरों की गुंजारों ने
कैसा गीत सुनाया है।।२।।
कहीं निर्मल धारा है
कहीं सागर खारा है,
कहीं गहरा पानी है
कहीं दूर किनारा है,
जगदीश तेरी महिमा
कोई जान न पाया है।।३।।
कोई चार के कंधों पर
दुनियां से जाता है,
कोई ढोल बजा करके
बारात सजाता है,
बेमोल ये सृष्टि का
कैसा चक्र चलाया है।।४।।
अपने से जिसने
मुलाकात कर ली।
दुनियाँ में उसने
बड़ी बात कर ली।।










