सज्जनों सुनकर विचारो बात मेरी आज की
सज्जनों सुनकर विचारो बात मेरी आज की
क्या आवश्यकता नहीं अब आर्य समाज की।।
नास्तिकता आस्तिकता को पछाड़े जा रही
नैतिकता की जड़ अनैतिकता उखाड़े जा रही
पश्चिमी सभ्यता यहां नित पैर गाड़े जा रही
सभ्यता भारत की देखो दिनदहाड़े जा रही
कौड़ी कीमत ना रही जब शर्म की और लाज की
क्या आवश्यकता नहीं अब आर्य समाज की॥1॥
छूआछूत बिमारी क्या भारत से बिलकुल हट गई
जाति पाति खत्म होकर वर्णों में क्या फट गई
झूठे पाखंडों मतों की जड़ क्या यहां से कट गई
यात्रा जीवन की क्या अब आश्रमों में बंट गई
जानकारी हो गई क्या अच्छी तरह
स्वराज की क्या आवश्यकता नहीं
अब आर्य समाज की॥2॥
अनमिली शादी क्या यहां पर अब कहीं होती नहीं
अबलायें विधवायें बाली क्या कहीं रोती नहीं
चाल चलचित्रों की क्या अश्लीलता बोती नहीं
दूषित प्रथा दहेज की क्या धर्म धन खोती नहीं।
क्या सुनाई हो गई दयानन्द की आवाज की
क्या आवश्यकता नहीं है आर्य समाज की ।।3।।
घूसखोरी अपहरण अपराध भ्रष्टाचार को
चोरी हत्या नास्तिकता दानवता व्यवहार को
प्रान्तीयता जातीयता गऊओं के संहार को
खत्म करके कौन देगा शांति संसार को
पास शोभाराम किसके औषधि सुख साज की
क्या आवश्यकता नहीं अब आर्यसमाज की॥4॥










