सहन कर लेती चोट तीरों की और भालों की
सहन कर लेती चोट
तीरों की और भालों की,
मगर ना सह सकी हूं,
चोट तेरे सवालों की।। टेक ।।
समझती थी सिंहनी के
शेर का ही जन्म हो,
हुई है आज माता
शेरनी श्रंगालों की।।1।।
मुझको था विश्वास कि मैं
बदल दूंगी दुनिया को,
मगर ना बदली कर सकी हूं
तेरे खयालों की ।।2।।
खेल में तू मस्त
मेरे देश अन्दर देखले,
बढ़ रही है आज
चौकड़ी चान्डालों की ।।3।।
मना रहे हैं जश्न पापी
बल्लमों की नोक पर,
खोपड़ी टांग करके
ललनाओं की लालों की।।4।।
देश धर्म प्रेमी है
तू लक्ष्य को ना भूलना,
जरूरत आज है दे
बहां खून के नालों की ।।5।।










