सदियों से जीव भटकता, है चैन अभी ना आया
सदियों से जीव भटकता
है चैन अभी ना आया
कई बार मरा जी-जी कर
फिर भी ना जीना आया
तह कर के ताक पे रख दीं
भक्ति की सभी किताबें
या खून पिया निर्धन का
या मदिरा जहर शराबें
हरी नाम के अमृत रस का (1)
इक जाम न पीना आया
सदियों से जीव भटकता
है चैन अभी ना आया
हाय मोर-पपीहा बन कर
पीय-पीय ना कभी पुकारा
सत्संग की वर्षा ऋतु में
मन धो कर नहीं निखारा
कई बार तेरे जीवन में
सावन का महीना आया
सदियों से जीव भटकता
है चैन अभी ना आया
जब पुण्य पाप का खाता
यमराज ने देखा भाला (2)
“नत्थासिंग” तेरा जीवन
सिर से पैरों तक काला
तब पुण्य पड़ गए फीके
पापों को पसीना आया
सदियों से जीव भटकता
है चैन अभी ना आया
कई बार मरा जी-जी कर
फिर भी ना जीना आया
सदियों से जीव भटकता
है चैन अभी ना आया










