सदाचार से प्रीत रही ना

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सदाचार से प्रीत रही ना

सदाचार से प्रीत रही ना
यूं भारत निर्बल हो गया
नहीं किसी का प्यार किसी को
गांठ गांठ में छल हो गया।

यहां पाखांडियों का मान होवे
विद्वानों का सत्कार नहीं
गन्दी गन्दी बिकें किताबें
वेदों से कोई प्यार नहीं
ग्राम नगर कोई ना ऐसा
जिसमें है तकरार नहीं
काम क्रोध मद्य लोभ मोह का
भाव यहां प्रबल हो गया।।1।।

बिल्ली कुत्ते गीदड़ों से
भारत के बच्चे डरने लगे
नहीं स्वास्थ्य का ध्यान रहा
अब फैशन ऊपर मरने लगे
ब्रह्मचर्य पालन को भूलकर
अनमिलती शादी करने लगे
भले बुरे का ज्ञान नहीं कुछ
बेईमानी की शरण लगे
स्वार्थ का बाजार गर्म है,
परमार्थ ओझल हो गया।।2।।

जिन्हें धनी शिरोमणि कहते थे
वह आज महा कंगाल हुए
जिन्हें सत्यव्रत धारी कहते थे
देखो वह आज चाण्डाल हुए
जो शेर बब्बर निर्भय थे
कभी वह डरपोक श्रंगाल हुए
धर्म कर्म को छोड़ दिया
इसलिए आज तंगहाल हुए
विद्या का भण्डार कभी था
आज देश पागल हो गया।।॥3॥

सुल्फा भांग शराब मांसखोरों की
यहां ना गिनती है
बदमाशों के मजे यहां
भक्तों की रुई सी पिनती है
सत्य सनातन धर्म ग्रहण करो
यही आखिरी विनती है
शेष जो धर्म दौलत बची
वह छलियों द्वारा छिनती है
खुदगर्जी का दौर देखकर
शोभाराम बेकल हो गया।।4।।