ऋषिवर न अपनी मुसीबत पै रोये।

0
73

ऋषिवर न अपनी मुसीबत पै रोये।

ऋषिवर न अपनी मुसीबत पै रोये।
जो रोये तो भारत की हालत पै रोये।।

ऋषियों का भारत कहाँ जा रहा है।
सभ्यता पुरानी को बिसरा रहा है।।
करा जो रहा है हिमाकत पै रोये। ।1।।
ऋषिवर न अपनी मुसीबत…….

न एक ईश्वरवाद की बात सूझे।
कबर ताजिये ईंट पत्थरों के पूजे ।।
कौम की मूर्खता व जहालत पै रोये।।2।।
ऋषिवर न अपनी मुसीबत……

अनाथ और बेवाएँ देखीं बिलखतीं।
रोटी के बदले में चोटियाँ कटर्ती ।।
लुटे लाल जाति के गुरबत पै रोये।।3।।
ऋषिवर न अपनी मुसीबत……

घृणा द्वेष अपनों से, गैरों से प्रीति।
बचेगी न वह कौम, जिसकी यह नीति।
कवि ‘वीर’ थोती, सुखावत पै रोये।।4।।
ऋषिवर न अपनी मुसीबत……..