ऋषि ऋण को चुकाना
ऋषि ऋण को चुकाना है
आर्य राष्ट्र बनाना है।
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे
चढ़ो बढ़ने का जमाना है।
देश के कोने-कोने में
संदेश सुनाना है।
हम कसकर कमर चले हैं निकले हैं,
इस मार्ग में ले मजबूत इरादा,
हम कभी न विचलित होंगे, न होंगे,
परवाह नहीं चाहें आये कितनी बाधा,
हमारा वेद खजाना है
जो सबसे पुराना है।
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे
चढ़ो बढ़ने का जमाना है।
असमानता की ये खाई
अब पाटती है,
समाज के आंगन से,
मजहब की ये दीवारें! हां दीवारें,
नहीं रखनी है माता के दामन में,
पाखण्ड गढ़ ढाना है
दलितों को उठाना है
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो
बढ़ने का जमाना है।
सूरज की किरण से तपकर, हां तपकर,
जब निकलेगा मेहनत का पसीना,
सोना उगलेगा यह धरती, हां धरती,
खुशहाली हो दूध दही का पीना,
खेतों में कमाना है उद्योग लगाना है।
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो
बढ़ने का जमाना है।
आपस के झगड़े सारे, हां सारे,
पंञ्चायत में अपने आप निपटाओ,
इस दहेज के चक्कर से, टक्कर से,
यह विनती करें समाज को बचाओ।
मंहगे का जमाना है ना
लुटना लुटाना है तो
मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो
बढ़ने का जमाना है।
सफलता का यही है वादा,
बोलना कम और काम ज्यादा।










