ऋषि के भक्तों भुला दिया
ऋषि के भक्तों भुला दिया
क्यों अपनी जिम्मेदारी को।
कहा था हम सन्देश वेद का
देंगे दुनिया सारी को॥ टेक ॥
बाल विवाह सतियों का
क्रन्दन गूंज रहा है कानों में।
अभी सती की प्रथा है
कायम चिता जले शमशानों में॥
बिना दहेज के दुल्हन की
चीखें गुम बन्द मकानों में।
कफन सुहाग का जोड़ा
बनता सास ननद के तानों में॥
सिंदूर मांग का नागिन बनकर
डस जाता बेचारी को ॥1॥
वैदिक वर्णव्यवस्था में ढल
कौन सा है परिवार रहा।
जातियता का सर्प विषैला
फन फैला फुंकार रहा॥
पञ्चयज्ञ की प्रथा गई कहां
अतिथि का सत्कार रहा।
गऊ पालना बन्द हुवा कुत्ते
बिल्लियों से प्यार रहा।
गऊ के गोबर और मूत्र से
घृणा हुई नरनारी को॥2॥
रूढ़ीवाद अन्ध-विश्वासों में
लोग फंसाये जाते हैं।
जगरातों के नाम पै नंगे
रास रचाये जाते हैं।।
दूध मुंहे शिशु भी टुकड़े
कर कर बलि चढ़ाये जाते हैं।
दण्ड की धारा से हत्या के
केस छिपाये जाते हैं॥
मानवता मिट रही बढ़ावा
मिल रहा अत्याचारी को ॥3॥
कपिल व्यास गौतम की
धरती पर अन्याय का चक्र चला।
सच्चाई रो रही न्याय का
झूठ ने जकड़ा हुआ गला॥
विद्वानों की मौन देखकर
धूर्त्ता ने बोला हमला।
धर्मध्वजी पुज रहे हैं
फिर से गुरुडम आज यहा फैला॥
भटक रहे भ्रम में ‘कर्मठ’
सर झुका रहे दुराचारी को॥4॥
नोट-स्वामी दयानन्द जी की मृत्यु
पर पौराणिक पंडित रोता हुआ कहता है।










