रात के अंधेरे में उठ कर सवेरे में
रात के अंधेरे में, उठ कर सवेरे में,
चले छोड़ कर अपना घर ।
ईश्वर को पाने की,
मंजिल पै जाने की,
राहों से थे बेखबर ।। टेक ।।
ठोकर पै ठोकर, खाते रहे वो,
सदमों पै सदमें, उठाते रहे वो।
जिधर जो भी रास्ता, बताया किसी ने,
उसी मार्ग पर पग, बढ़ाते रहे वो।
कभी खाये बैंगन सूखे,
कभी दिन बिताये भूखे,
बड़ा ही कठिन था सफर ।।1।।
सन्तों महन्तों के, अखाड़ों में विचरे,
नगर ग्राम झाड़ों, पहाड़ों में विचरे ।
कभी अलखनन्दा, कभी नर्मदा तट,
शेरों बघेरों की दहाड़ों में विचरे।
आखिर मे चलते चलते,
सूरज के, ढलते ढलते,
मथुरा मिले गुरूवर ।।2।।
सच्चे गुरु के, शिष्य निराले,
नहीं जान पाये, उन्हें दुनिया वाले।
चुभाते रहे कटु, शब्दों के भाले,
दुखाते रहे जख्म, दुखी दिल के छाले।
पत्थर किसी ने मारे, विषधर किसी ने डारे,
किसी ने पिलाया जहर । |3 ||
भटके हुओं को मार्ग बताया,
मुर्दा दिलो को जीना सिखाया।
जन-जन के ‘प्रेमी’ सत्य के पुजारी
अविद्या अन्धेरा ऋषि ने मिटाया।
हमारे ऊपर ऋण उनके,
इतने है सब गिन गिन के,
चुका ना सकेंगे उम्र भर ।।4 ||
वह ज्ञान प्रभा कर अस्त हुआ
पर दीप करोडों जला गया
ऋषि दयानन्द सोये जग को
दे ज्ञान रश्मियां जगा गया










