राम सिमर के रहम करे
राम सिमर के रहम करे
न फिर कैसे सुख पावेगा
कृष्ण सिमर के कर्म करे
न जग से यूं ही जाएगा।
ओ भगवान के भजने वाले
क्या भगवान को जाना है।
पास पड़ोसी और दीनों में
क्या उसको पहचाना है।
जब तक तेरी मैं न मिटेगी
प्रभु नजर न आवेगा।
कृष्ण सिमर के कर्म कर
न जग से यूं ही जाएगा।
यह संसार कर्म की खेती
जो बोया सो काटे तू
प्रेम प्यार से सींच ले
इसको अवसर फिर यह न आवे
चार दिनों का है यह जीवन
कब तक ठोकर खाएगा
कृष्ण सिमर के कर्म करे
न जग से यूं ही जाएगा।
अन्दर तेरे अंतरयामी
रोज़ तुझे समझाता है।
भला बुरा क्या करना
तुझ को राह तुझे दिखाता है।
मन की कहीं पे चलने वाले
फिर पीछे पछताएगा।
कृष्ण सिमर के कर्म करे
न जग से यूं ही जाएगा।
शरण गहे बिन जाता
अवसर निष्फल जीवन है
तेरा जन्म मरण की फांस न टूटी
दुःखों ने है नित घेरा
पा गठरिया भारी हो गई
कैसे बोझ उठाएगा
कृष्ण सिमर के कर्म करे
न जग से यूं ही जाएगा।
एक भाई दूसरे भाई की
आपत्ति को बांटेगा,
तो रामायण का निर्माण होगा
और अगर सम्पत्ति का बंटवारा करेगा,
तो महाभारत शुरु हो जाएगा। – आचार्य चन्द्रशेखर










