रहने को भवन वस्तर भोजन सुख धन से मिलें हज़ार ।

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धन से प्रीति

(तर्ज – ऐ जाने चमन तेरा गोरा बदन)

रहने को भवन वस्तर भोजन सुख धन से मिलें हज़ार ।
क्यों फिर भी आदमी की तबीयत है बेकरार।
रहने को भवन वस्तर भोजन………..

१. इक धन ही सिरफ़ दुनियाँ में सब कुछ समझ लिया
जो धनपती है उसको तो दिल से दिया बिसार।
रहने को भवन वस्तर भोजन……….

२. दो शब्द भी न सिमरन के आए ज़बान पर
यों इसके पास करने को बातें हैं बेशुमार।
रहने को भवन वस्तर भोजन……….

३. मालिक का भजन करने को मिलता समय नहीं
सिनेमा का शौक पूछो तो हर वक्त हैं तैयार।
रहने को भवन वस्तर भोजन………..

४. रख हाथ अपने दिल पे तू ऐ ‘पथिक’ सच बता
दौलत से प्रीत कितनी है कितना प्रभु से प्यार।
रहने को भवन वस्तर भोजन………..