रचा ब्रह्माण्ड है जिसने, उसे भगवान् कहते हैं।
रचा ब्रह्माण्ड है जिसने,
उसे भगवान् कहते हैं।
जो है उपदेश वेदों का,
उसे सत्य ज्ञान कहते हैं।।1।।
हैं गिरतों को उठाता जो,
उसे दयावान् कहते हैं।
जो भूलों को दिखाये पथ,
उसे महान् कहते हैं।।2।।
जो निर्बल की करे रक्षा,
उसे बलवान् कहते हैं।
सताये जो गरीबों को,
उसे शैतान कहते हैं।।3।।
पिता-माता को जो दुःख दे,
उसे सन्तान मत कहना।
करे निज कुल को जो रोशन,
उसे सन्तान कहते हैं।।4।।
करे कल्याण जो जग का,
उसे विज्ञान कहते हैं।
करे जो नष्ट दुनियाँ को,
उसे अज्ञान कहते हैं।।5।।
जो कंजूस, मक्खीचूस,
उसे धनवान् मत समझो।
करे जो दान हाथों से,
उसे धनवान् कहते हैं।।6।।
जहाँ इन्सान बसते हों,
शहर घर ग्राम कहते हैं।
जहाँ रहता नहीं मानव,
उसे बियावान कहते हैं।।7।।
कफन हम उसको कहते हैं,
जो मुर्दे पर पड़ा देखा।
जहाँ मुर्दे ही जलते हों,
उसे श्मशान कहते हैं।।8।।
जो गुण को धार लेता है,
उसे गुणवान् कहते हैं।
जो चलता चाल है टेढ़ी,
उसे हैवान कहते हैं।।9।।
करे व्यवहार जो झूठा,
बना कपटी छली, द्वेषी।
ऐसे नर नीच पापी,
को बेईमान कहते हैं।।10।।
मुसीबत में जो हँसता है,
उसे इन्सान कहते हैं।
जो रो-रो करके जीता है,
उसे नादान कहते हैं।।11।।
कत्र्तव्य है ‘विश्वप्रेमी’ का,
धर्म हित जान दे देना।
धर्म पर जो भी मरता है,
उसे बलिदान कहते हैं।।12।।










