प्यार तुमसे करूँगा सत्य-ऋत पर चलूँगा

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प्यार तुमसे करूँगा सत्य-ऋत पर चलूँगा

प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा
मिला जीवन जो
ज्ञानी पूजक बनूँगा
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

प्रश्न उठा जग किसके लिए है?
वेद कहे तेरे लिए है
आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः (ऋग्वेद 10/177/3)
पुनः पुनः लोक में जीव जिये है
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

जीव के लिए यदि जग ना होता
असंख्य पदार्थ क्यों देता ?
औषधियाँ, जल, वन, उपवन भी
प्रयोजन बिन क्यों देता?
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

द्यौ-पृथिवी पर्यन्त पदार्थ
प्रभु की कृपा से मिला है
भुवन-लोक महिमा के कारण
दान का द्वार खुला है
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

निष्कामता प्रीति साधन बनेगा
मृत्यु साधन अन्यथा बनेगा
शान्ति के अभिलाषी सुधी-साधक
अनुगति प्रभु की करेगा
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

ऐ जीव! सारी सृष्टि तेरे लिए है
पर पाएगा फल,
कर्म जो किए हैं
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा
मिला जीवन जो
ज्ञानी पूजक बनूँगा
प्यार तुमसे करूँगा
सत्य-ऋत पर चलूँगा

ओ३म् तुभ्ये॒मा भुव॑ना कवे महि॒म्ने सो॑म तस्थिरे ।
तुभ्य॑मर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः ॥
ऋग्वेद 9/62/27

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई